अध्याय 7: मोहिनी
लावण्या गर्भपात कराना चाहती थी। उसने एक डॉक्टर से सलाह ली, लेकिन डॉक्टर ने मना कर दिया। डॉक्टर ने कहा कि गर्भपात
लावण्या की जान के लिए ख़तरनाक हो सकता है।
जब आदित्य को पता चला कि लावण्या गर्भपात कराना चाहती है, तो वह लावण्या से मिलने उसके मायके गया। आदित्य ने लावण्या से
कहा कि उसे चिंता करने की ज़रूरत नहीं है, वह पैदा होने वाले
बच्चे की ज़िम्मेदारी खुद उठाएगा। लावण्या के भीतर बच्चा पल रहा था, लेकिन उसके मन में उस बच्चे के लिए कोई अपनापन नहीं था। उसके लिए वह एक नई
ज़िंदगी नहीं, बल्कि एक टूटे हुए वादे की निशानी थी।
एक सुबह लावण्या मोहिनी के बिस्तर पर बैठी थी और उसे कटे हुए फल खिला रही थी।
मोहिनी की नींद खुली, उसकी आँखें बोझिल थीं और वह थोड़ी उलझन में थी।
“आप यहाँ हैं,” मोहिनी ने भर्राई आवाज़
में कहा।
लावण्या मुस्कुराई और मोहिनी के माथे से बाल हटाते हुए बोली,
“मुझे हमेशा तुम्हारे साथ होना चाहिए था, बेटा।
लेकिन अब… अब मैं सच में यहाँ हूँ। पूरी तरह तुम्हारे साथ।”
उसकी आँखें भर आईं और उसने मोहिनी का हाथ कसकर पकड़ लिया, जैसे कभी छोड़ना ही न चाहती हो।
मोहिनी ने हल्की-सी मुस्कान के साथ कहा,
“आप मेरी माँ हैं। मुझे बस यही चाहिए था।”
“अगर तुम न होतीं, तो विनय का बचना
मुश्किल था। शायद इसी वजह से भगवान ने तुम्हें इस धरती पर भेजा है,” लावण्या ने कहा।
“ऐसा नहीं है माँ, वह मेरा भाई है। उसे
कैसे कुछ हो सकता है?” मोहिनी बोली।
“मुझे अपनी गलती का एहसास हो गया है। विनय के अस्पताल से छुट्टी
मिलने के बाद हम सब अपने घर में एक परिवार की तरह साथ रहेंगे,” लावण्या ने कहा।
दरवाज़े के पास खड़े आदित्य ने भी यह सब सुना। उसके चेहरे पर मुस्कान थी।
अपने वादे के अनुसार, लावण्या विनय के साथ आदित्य के घर आ गई और घर की ज़िम्मेदारी
संभाल ली। आदित्य और लावण्या का रिश्ता भी बिना किसी शर्त के फिर से खिलने लगा।
कभी-कभी टूटी हुई चीज़ें पहले से भी ज़्यादा खूबसूरत हो जाती हैं।
आख़िरकार लावण्या की डिलीवरी का समय आ गया। डिलीवरी रूम में एंटीसेप्टिक की
तीखी गंध और तनाव भरा माहौल था। नर्सें इधर-उधर दौड़ रही थीं, डॉक्टर आदेश दे रहे थे, और मशीन की धीमी
बीप की आवाज़ गूंज रही थी।
जैसे ही बच्चे के रोने की आवाज़ गूंजी, लावण्या ने अपना चेहरा दूसरी ओर फेर लिया।
“लड़की हुई है,” नर्स ने नरमी से कहा।
“बिल्कुल स्वस्थ है।”
जैसे ही आदित्य को खबर मिली, वह तुरंत अस्पताल पहुँचा। उसने गुलाबी कपड़े में लिपटी बच्ची
को देखा और उसे गोद में उठा लिया। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।
“वह बहुत सुंदर है,” उसने फुसफुसाकर कहा।
“हम उसका नाम मोहिनी रखेंगे।”
लावण्या चुप रही।
मोहिनी के जन्म के एक हफ्ते बाद आदित्य उसे अपने साथ घर ले आया। उसने काम से
अवकाश ले लिया ताकि वह उसे पूरा समय दे सके। उसने एक आया रखी। विनय हफ्ते में एक
बार आदित्य के घर आता था। वह अपनी छोटी बहन मोहिनी से बहुत प्यार करता था और उसके
साथ खेलता था।
अब मोहिनी की देखभाल सिर्फ़ आदित्य और आया करते थे—उसे दूध पिलाना, लोरियाँ सुनाना, रात में गोद में
टहलाना। आदित्य के लिए मोहिनी सिर्फ़ बेटी नहीं थी, बल्कि
अपनी गलती का प्रायश्चित थी। उसके मन में एक उम्मीद थी—शायद इससे पुराने रिश्ते
फिर से जुड़ जाएँ।
लावण्या अपना ज़्यादातर समय ऑफिस में बिताती थी। स्कूल से लौटने के बाद विनय
अपने ननिहाल में रहता था।
अध्याय 8: विनय की लंदन यात्रा
साल किताब के पन्नों की तरह पलटते चले गए। विनय एक आत्मविश्वासी और होनहार
युवक बन गया। अठारह साल की उम्र में उसने बोर्ड परीक्षा में टॉप किया। उसकी मेहनत, अनुशासन और अंदरूनी ताकत ने लावण्या और आदित्य को गर्व से भर
दिया।
आदित्य और विनय का रिश्ता बिना किसी शर्त के, स्वाभाविक और गहरा हो गया था। विनय के लिए आदित्य “पापा”
थे—वह इंसान जो हर स्कूल की सफलता में उसके साथ खड़ा रहा, हर
किशोर गुस्से को धैर्य से सुना।
लंदन रवाना होने से एक दिन पहले, विनय आदित्य और मोहिनी से मिलने आया। पूरा परिवार डिनर टेबल
पर बैठा था। चौदह साल की मोहिनी विनय के पास बैठी थी और उसका हाथ कसकर पकड़े हुए
थी।
“हर वीकेंड वीडियो कॉल करना, वादा करो,”
मोहिनी ने मुँह बनाते हुए कहा।
विनय हँसा और उसकी चोटी खींचते हुए बोला,
“वादा। और तुम्हारे लिए असली इंग्लिश चॉकलेट लाऊँगा, लाजपत नगर वाली नकली नहीं।”
लावण्या के अलावा, आदित्य और मोहिनी भी विनय को एयरपोर्ट छोड़ने आए। तीनों ने
एक-दूसरे को कसकर गले लगाया। भावनाओं में संयम रखने वाले आदित्य की आँखों में भी
आँसू थे।
“तुम ठीक रहोगे,” आदित्य ने उसके कंधे पर
हाथ रखते हुए कहा। “जहाँ भी रहो, हम हमेशा तुम्हारे साथ
हैं।”
“मुझे पता है, पापा,” विनय ने कहा। “सब कुछ के लिए धन्यवाद।”
लंदन बेहद खूबसूरत था। विनय को वहाँ की व्यवस्था, ऐतिहासिक इमारतें और अंडरग्राउंड ट्रेनों की लय बहुत पसंद आई।
कॉलेज जीवन रोमांचक था। उसने क्लब जॉइन किए, आर्थिक
सिद्धांतों पर बहस की और भारतीय खाने के बिना जीने के लिए खाना बनाना भी सीख लिया।
अमेलिया टेलर एक सुंदर और बुद्धिमान लड़की थी। वह उसकी साहित्य की क्लास में
थी—सुनहरे बाल, नीली आँखें, तेज़ दिमाग और मोहक
मुस्कान। जो भी अमेलिया से मिलता, उसकी बातों और सुंदरता से
प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाता। जल्द ही विनय और अमेलिया दोस्त बन गए।
ग्रुप प्रोजेक्ट से शुरू होकर कॉफी डेट्स और थेम्स नदी के किनारे आधी रात की
सैर तक उनका रिश्ता बढ़ता चला गया।
वह अलग थी—आत्मनिर्भर, रचनात्मक। वह भी एक सिंगल-पैरेंट परिवार से थी, जैसे विनय।
उसकी मौजूदगी से विनय को सुकून मिलता था। वह लावण्या जितनी मजबूत और मोहिनी
जितनी चंचल थी।
कुछ ही महीनों में दोस्ती प्यार में बदल गई। दो साल बीत गए।
गर्मियों की छुट्टियों में जब विनय दिल्ली आया, तो वह अमेलिया की तस्वीरें साथ लाया। उसने आदित्य और लावण्या
को उसके बारे में बताया। लावण्या ने साफ़ कहा कि अमेलिया को भारत आकर रहना होगा,
जबकि आदित्य शालीन बना रहा। मोहिनी ने उसे छेड़ते हुए कहा,
“तो यही है वो लड़की जिसने मेरे भाई का दिल चुरा लिया?”
लंदन लौटने के बाद विनय ने अमेलिया को अपनी माँ की इच्छा बताई। लेकिन अमेलिया
भारत में बसना नहीं चाहती थी।
“मैं तुम्हारे परिवार और संस्कृति का सम्मान करती हूँ,” उसने पार्क की बेंच पर बैठकर कहा,
“लेकिन मेरा काम, मेरी ज़िंदगी—सब यहीं है।
मैं खुद को उखाड़कर कहीं और नहीं लगा सकती।”
विनय टूट गया। भारत उसका घर था—माँ, मोहिनी, आदित्य। लेकिन अमेलिया उसका
प्यार थी। उसने बहुत कोशिश की, लेकिन अमेलिया नहीं मानी।
आँसू, चुप्पी, माफ़ियाँ, झगड़े—और आख़िरकार रिश्ता टूट गया।
विनय दिल से टूट गया। वह अमेलिया से सच्चा प्यार करता था। दर्द भुलाने के लिए
उसने शराब का सहारा लिया। धीरे-धीरे शराब उसकी ज़रूरत बन गई।
आख़िरी सेमेस्टर के बाद वह दिल्ली लौट आया। वह किसी से बात नहीं करता, ज़्यादातर अपने कमरे में बंद रहता। शराब उसकी कमज़ोरी बन चुकी
थी। लावण्या यह सब देखकर बेहद दुखी हुई।
जब आदित्य और मोहिनी को पता चला, तो उन्होंने विनय से बात करने की कोशिश की।
आदित्य ने कहा,
“किसी के चले जाने से ज़िंदगी खत्म नहीं होती।”
लेकिन किसी बात का उस पर कोई असर नहीं हुआ।
अध्याय 9: संकट और बलिदान
एक रात विनय के पेट में तेज़ दर्द उठा और पेट फूलने लगा। वह दर्द से कराहने
लगा। उसकी आवाज़ सुनकर लावण्या जाग गई। उसने तुरंत अस्पताल चलने को कहा।
अचानक विनय को खून की उल्टी हुई और वह बेहोश हो गया। लावण्या घबरा गई। अपने
माता-पिता की मदद से उसने विनय को कार में डाला और अस्पताल ले गई।
अस्पताल में भर्ती कर लिया गया। जाँच हुई। रात में ड्रिप लगाई गई, जिससे थोड़ी राहत मिली।
सुबह लावण्या विनय के बिस्तर के पास बैठी, उसका हाथ पकड़े प्रार्थना कर रही थी। मशीनों की आवाज़ और
नर्सों की भागदौड़ के बीच आदित्य और मोहिनी भी पहुँच गए।
रिपोर्ट आ चुकी थी—तीव्र लिवर फेल्योर, शराब और तनाव की वजह से।
डॉक्टर ने गंभीर स्वर में कहा,
“उसे लिवर ट्रांसप्लांट की ज़रूरत है। तुरंत। वरना उसकी जान जा सकती
है।”
लावण्या ने तुरंत अपना लिवर देने की पेशकश की, लेकिन वह मैच नहीं हुई। फिर आदित्य आगे आया—वह भी मैच नहीं
हुआ।
उम्मीद टूटने लगी। लावण्या की आँखों में आँसू थे।
“मैं दूँगी,” मोहिनी ने कहा।
“नहीं बेटा, तुम बहुत छोटी हो,” आदित्य बोला।
“मैं अपने भाई के लिए यह करूँगी,” मोहिनी
अड़ी रही।
टेस्ट हुए—और चौंकाने वाली बात यह थी कि मोहिनी परफेक्ट मैच थी। लेकिन वह
सिर्फ़ सत्रह साल की थी। कानूनन अनुमति नहीं थी।
कोर्ट केस, मानसिक जाँच, अपीलें—आख़िरकार विशेष
अनुमति मिल गई।
ऑपरेशन अगले दिन तय हुआ।
OT में ले जाते वक्त लावण्या ने मोहिनी का हाथ कसकर पकड़ा।
“मुझे माफ़ कर दो… मैं तुम्हें पहले प्यार नहीं कर पाई।”
मोहिनी हल्के से मुस्कुराई,
“आप मेरी माँ हैं। बस यही काफ़ी है।”
पाँच घंटे बाद डॉक्टर बाहर आए।
“ट्रांसप्लांट सफल रहा।”
मोहिनी पास के बिस्तर पर मुस्कुरा रही थी।
“लगता है, मैंने आपकी सारी चॉकलेट का कर्ज़
चुका दिया,” उसने कहा।
विनय की आँखें भर आईं।
और लावण्या—उस पल पहली बार खुद को पूर्ण महसूस कर रही थी।
अध्याय 10: घावों का भरना
विनय धीरे-धीरे ठीक हो रहा था। वह कभी-कभी मोहिनी को देखता और बुदबुदाता,
“उसने मुझे बचाया… मेरी बहन ने।”
मोहिनी के बलिदान की खबर पूरे परिवार, पड़ोस और अस्पताल में फैल गई। हर कोई उसे अपने-अपने तरीके से
सराहने लगा।
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