अध्याय
4: बिछड़ाव और मातृत्व
मुंबई का मानसून—बस पूछो मत, पूरा शहर जैसे
किसी फिल्म का सेट बन जाता है। बादल ऐसे कि सूरज भी शर्म से छुप जाए, बिजली गड़गड़ाती है जैसे आसमान में कोई ड्रम बजा रहा हो, और बारिश इतनी कि छतें भी थक जाएं। जहां बाकी लोग मुंह बनाते घूमते हैं,
वहीं लावण्या के लिए तो ये मौसम जादू है। उसे इन बूंदों में कविताएँ
नज़र आती हैं, और इस शोर में भी सुकून मिलता है।
उस दिन सुबह-सुबह, बालकनी में खड़ी थी लावण्या। हाथ में चाय, आंखें अपने छोटे विनय पर, जो पालने में मस्त सो रहा
था। बारिश की वो टप-टप—सीधा दिल तक जाती है, है ना?
शहर के उस पार, वेभव काम से लौट रहा था। फोन किया— “डिनर रख मत लेना, ट्रैफिक में फँस गया हूँ।”
लावण्या हँसी— “धीरे-धीरे आना। मैं और विनय
तेरे लिए बिस्तर गर्म रखेंगे।”
कौन जानता था, ये हँसी बस इतनी देर की मेहमान
थी।
पड़ोसी भागे आए, उसे बेहोश पाया—फोन अब भी हाथ में।
अब वह सिर्फ़ अपने बेटे विनय के लिए जीना चाहती थी।
गम, दुःख उसके आस-पास ही रहा, कोनों में दुबका रहा, बल्कि साथ चलता रहा, दोस्त बनकर नहीं, पर परछाईं की तरह।लेकिन लावण्या ने धीरे-धीरे उसे अपने ऊपर हावी होने देने के बजाय अपने साथ चलने देना सीख लिया। विनय के लिए उसने फिर से जीना सीख लिया।
अध्याय
5: पुराने चेहरे,
नए रिश्ते
दिल्ली में पतझड़ का मौसम कुछ अलग ही होता है। उस दिन आसमान बिल्कुल नीला था। दोपहर में गर्मी और उमस थी। बिल्कुल क्लासिक दिल्ली का माहौल। खैर, लावण्या दक्षिण दिल्ली में इस छोटी सी किताबों की दुकान में गई, शायद कुछ देर के लिए दुनिया से दूर जाना चाहती थी।
ख़ुशकिस्मती से, आदित्य भी उस दिन उसी किताबों की दुकान में था। जब किस्मत किसी को मिलाने वाली होती है, तो एक इत्तेफ़ाक होता है। लावण्या की नज़र आदित्य पर पड़ी। आदित्य को देखकर वह हैरान रह गई।
आदित्य ने भी उसकी तरफ़ देखा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह उसे देखकर हैरान है या बस चुपचाप खुश है। वह ऐसे खड़ा रहा जैसे उसे आखिरकार पता चल गया हो कि वह कहाँ का है। लेकिन वो आँखें? हमेशा की तरह, कोमल और हमेशा खोजती हुई, मानो उसे उम्मीद हो कि ब्रह्मांड उसे कोई संकेत देगा।
उस रात… हां, वही बदनसीब रात। अंधेरी
के पास एक कार—पानी, फिसलन, और एक झटका। कार का ड्राइवर कुछ ही सेकंड में वहीं खत्म। वेभव की सांस चल
रही थी, जिस्म से खून बह रहा था। वो बेहोश था। राहगीरों ने देखा तो वेभव को कार के
बाहर निकाला और पास के हस्पिटल में पहुंचया। डाक्टरों की कोशिशो के बवजूद वेभव को
बचाया नहीं जा सका।
जब वेभव की मोत के बारे में पुलिस का फोन आया, लवण्या
को लगा किसी ने बेहूदा मज़ाक किया है। पूरी बॉडी जड़ हो गई, जैसे
किसी ने रिमोट से पॉज़ कर दिया हो। बस इतना याद है कि वो चिल्लाई थी—कितनी देर, कितनी तेज़, पता
नहीं।
इसके बाद के दिन? सब धुंधला सा। संस्कार, रिश्तेदारों
का हल्ला, और वो बेमन की संवेदनाएँ। वो जी तो रही थी,
पर जैसे किसी और की ज़िंदगी थी। विनय को दूध पिलाना, नहलाना, सुलाना—सब मशीन की तरह,
खुद आधी सोई-सी।
सिर्फ़ चौबीस की उम्र में विधवा हो गई थी, शायद ये दर्द ही उसकी
ताकत बन गया। । लावण्या अब अकेली माँ थी, उसका बेटा उसकी पूरी दुनिया बन गया था। लवण्या
का अब मुंबई में कोई नही था। माँ-बाप और
कुछ पुराने दोस्तों की मदद से मुंबई छोड़ दी, सीधा दिल्ली लौट आई। वही पुराना घर, अब नया सहारा।
"आदित्य..."
लावण्या के लफ्ज़ कांप से गए।
वो
हंसे, या रोए—कुछ समझ नहीं आ रहा था उसे। वो धीरे-धीरे उसके पास पहुंची। दोनों कुछ देर
तक बस आंखों से बातें करते रहे। आँखों में जैसे सालों का गुस्सा, प्यार, शिकवा—सब तैर रहा था।
आदित्य
बोला, "कितने साल बाद
मिल रहे हैं... चलो, एक कॉफी हो जाए।"
लावण्या
ने बगेर किसी झिझक के तुरंत हाँ कर दी। दोनों एक कैफे में बैठ गए, कॉफी की खुशबू में
डूबे।
"क्या
कर रहे हो आजकल?" लावण्या ने खामोशी को तोडते हुए पूछा।
"कुछ
खास नहीं, मास्टर्स के बाद एक
सरकारी रिसर्च सेंटर में नौकरी कर रहा हूँ," आदित्य ने
हंसते हुए जवाब दिया।
लावण्या
ने थोड़ा तंज में कहा,
"शादी कर ली होगी... पत्नी से मिलवा दो कभी।"
आदित्य ने
कोई जवाब नहीं दिया; वह बस उसकी आँखों में देखता रहा। लावण्या की शादी के बाद आदित्य ने शादी
का विचार त्याग दिया। उसने सिर्फ़ अपने काम से शादी की थी।
दिन
हफ़्तों में बदल गए और हफ़्ते महीनों में बदल चुके थे।, लवण्या,
जिसने वेभव के मरने के बाद अपने दिल के चारों ओर एक किला बना लिया
था, अब खिड़कियाँ खोलने लगी ताकि थोड़ी रोशनी अंदर आ सके।
आदित्य ने लवण्या से प्यार करना कभी नहीं छोड़ा, इसीलिए उसने अब तक शादी नहीं की थी। जब से आदित्य ने लवण्या को फिर से देखा, उसका दिल फिर से लवण्या के लिए धड़कने लगा।
एक शाम की बात थी, चारों तरफ शांति, हवा में हल्की ठंडक
थी। आदित्य लवण्या से एक काफी शाप में मिला और उसने आखिरकार अपना दिल खोल कर कह दिया।
"लवण्या...
इतने साल दूर रहकर भी,
दिल में हमेशा बस तुम ही रही। दोबारा देखकर लगा—मैं तुम्हें कभी भूल ही नहीं पाया। आज भी उतना ही चाहता हूँ
तुम्हें।"
लवण्या
कप को घूरती रही,
जैसे उसमें जवाब छुपा हो। हाथ की पकड़ इतनी टाइट, जैसे कप तोड़ देगी अभी। धीरे से बोली,
"मैं
वेभव से प्यार करती थी... और मुझे कोई अफसोस नहीं। लेकिन अब वो कहानी खत्म हो गई
है।"
एक
लंबी सांस, फिर बोली "आदित्य, अब मैं वही लवण्या नहीं रही।
अब मैं माँ हूँ, किसी की विधवा भी हूँ।"
आदित्य
बस मुस्कुरा दिया,
जैसे सब समझ गया हो।
"मुझे
कोई परफेक्ट इंसान नहीं चाहिए,
लवण्या। तुम्हारी हर कमी, हर डर, सब मंज़ूर है। मैं तुम्हारे साथ, विनय के साथ,
नई शुरुआत करना चाहता हूँ।"
लवण्या
की आंखों में हल्की बेचैनी थी।
"आदित्य, इतना आसान नहीं है।
लोग बातें बनाएंगे, समाज क्या-क्या बोलेगा!"
आदित्य
शांत था, बोला—
"मुझे
कल भी लोगों की परवाह नहीं थी,
आज भी नहीं है। बस तुम चाहिए।"
लावण्या
खामोश रही। उठी और चुपचाप चली गई।
एक
हफ्ता बीत गया...
फिर
एक दिन, लावण्या ने आदित्य को
कॉफी शॉप बुलाया। थोड़ी इधर-उधर की बातें, फिर बोली—
"ठीक
है, शादी कर लेंगे...
लेकिन एक बात है, या यूं कह लो मेरी एक
शर्त है।"
आदित्य
ने ध्यान से सुना।
"अब
और बच्चे नहीं," लावण्या ने साफ बोल दिया। "विनय ही मेरी दुनिया है। अगर मेरे साथ दुनिया
बसाना चाहते हो तो विनय ही हमारा बेटा होगा, बस वही एक बच्चा रहेगा।"
आदित्य
कुछ देर के लिए चुप हो गया,
मन में हल्की सी कसक आई, मगर आखिरकार मान गया।
"ठीक
है," उसने कहा,
हल्की-सी मुस्कान के साथ, "डील
पक्की।"
अब, आदित्य के माता-पिता और परिवार वाले खुश नहीं थे।
उनका एक ही राग था। तुम एक विधवा से, एक बच्चे की माँ से,
शादी करोगे, और वो भी दूसरी जात में, एक अंतर्जातीय विवाह। आदित्य ने उन्हें
समझाने की कोशिश की, लेकिन उसके माता-पिता अपना आपा खो बैठे।
आदित्य ने अपना सामान पैक किया और घर छोड़ दिया। अब उसे परिवार की परवाह नहीं थी।
वह लवण्या से शादी करने का पक्का इरादा कर चुका था।
शादी छोटी
थी, बस
परिवार, कुछ दोस्त, एक शांत मंदिर। लवण्या
अपनी शादी की साड़ी में बहुत खूबसूरत लग रही थी। विनय उसके बगल में बैठा मुस्कुरा
रहा था। पुजारी ने मंत्र पढ़े और दोनों ने पवित्र अग्नि के फेरे लिए। शादी संपन्न
हुई।
"अब तुम मेरा परिवार हो। तुम्हारी हर खुशी और हर दुख मेरा है," आदित्य ने कहा।
अध्याय 6:
एक अनचाहा मोड़
पूरा साल फिसल गया जैसे सर्दी की हवा – पता
ही नहीं चला कब आया, कब गया।
आदित्य अब विनय को अपना बेटा ही मानता था। हर शाम ऑफिस से आते ही
वही रूटीन – विनय को गोद में उठा लेना, खिलखिलाना, कभी पार्क, कभी
बाज़ार। विनय की मुस्कान घर की दीवारों तक
को रोशन कर देती थी।
लावण्या ये सब देखकर दिल से खुश थी, सच में।
धीरे-धीरे सब नार्मल लगने लगा। दोनों ने मिलकर विनय का स्कूल में
एडमिशन करवा दिया। अब सुबह-सुबह आदित्य ऑफिस चले जाता, विनय
स्कूल चले जाता , और लावण्या घर में अकेली रह जाती थी। वह
दिन भर बोर होती रहती थी। लवण्या ने आदित्य से सलह करके एक मीडिया हाउस में अप्लाई किया, और उसे जॉब भी मिल गई।
लवण्या ने आदित्य से शादी के वक्त एक शर्त रखी थी उसको – कोई
और बच्चा नहीं चाहिए। इस बात पर दोनों के बीच काफी लंबी-चौड़ी बातचीत हो चुकी थी।
प्यार था, अपनापन भी, लेकिन आदित्य
हमेशा इस बात का ध्यान रखता – कहीं कोई ‘गलती’ न हो जाए। वो जानता था, लवण्या
का भरोसा अब काँच की तरह है – जरा सा भी हिला, तो बिखर जाएगा।
मगर, किस्मत को कौन रोक पाया है अब तक? वो एक रात, दोनों नोएडा में दोस्त की सगाई में गए
थे। वहां रोशनी, म्यूजिक, हँसी,
सब कुछ था। लावण्या सालों बाद बिंदास डांस कर रही थी – जैसे सब दुखों को फेंक दिया हो किसी कोने में।
आदित्य चुपचाप देख रहा था – उसकी आँखों में,
खुद के लिए भी तसल्ली थी शायद। इतने झंझटों के बाद, आज उसकी बीवी हँस रही थी – ये ही जीत थी उसके लिए। रात देर तक दोनों पार्टी के असर में रहे –
शराब, संगीत, सब कुछ।
दोनो पर नशा हावी हो चुका था। फिर दोनो घर लोट आए। मौसम और माहौल दोनो रंगीन था,
दोनों भी बहक गए। उस रात वो ‘एहतराम’ नहीं रहा, आदित्य
ने कोई प्रोटेक्शन नहीं लिया। बस वही एक
रात।
इसके बाद लावण्या तो ऑफिस के काम में लग गई। वो एक करप्शन की
स्टोरी की रिपोर्टिंग में डूब गई, एक बड़ा
घोटाला उजागर करने में लगी थी। कुछ हफ्तों तक वह उस पर काम करती रही। कुछ महीनो
बाद उसे अजीब सी थकावट लगने लगी, मुंह का स्वाद बिगड़ गया, सुबह-सुबह
उबकाई, उल्टी।
शुरू में लवण्या ने सोचा ये
सब स्ट्रेस की वजह से हो रहा होगा।उसने यह मम्मी को बताया मम्मी ने ड्राय फ्रूट्स
खिलाए, लेकिन जब कुछ हफ्तों तक हालत सुधरी नहीं तो डॉक्टर के
पास गई।
डॉक्टर ने टेस्ट किए, रिपोर्ट आई – प्रेग्नेंसी
पॉजिटिव।लावण्या को तो जैसे बिजली लग गई। कुछ देर तक बैठी रही, एकदम सन्न। फिर उसका चेहरा – बस, खाली। सिर में घूमता रहा।
“आदित्य ने मुझे धोखा दिया?”
उसने अफने आप से कहा।
जब आदित्य को बताया, वो भी स्तब्ध रह गया। उसकी आवाज़ जैसे फुसफुसा रही
थी – “बस वही एक रात… वो भी मेरी गलती
थी…”
“गलती?” लावण्या की आवाज़ काँप रही थी,
आँखों में आंसू थे। “मैंने शर्त रखी थी –
कोई और बच्चा नहीं चाहिए। तुम्हें याद है न? तुमने
वादा किया था, क्या हुआ तुम्हारे वादे का, तुमने मुझसे वादा खिलाफी की”
आदित्य ज़मीन में गड़ा जा रहा था – “ मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं था, यह सब जान बूझकर
नहीं हुआ, लावण्या।”
आदित्य की किसी बात पर लावण्या को अब यकीन नही था। उसका दिल टूट गया
था, वो रो रही थी, भीतर से बिल्कुल खाली। आदित्य ने बहुत
मनाया, समझाया, पर लावण्या ने एक न
सुनी। विनय को उठाया, सामान पैक किया – और चुपचाप मायके चली गई।



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